संतोष

संतोष, आलसी और अकर्मण्य पुरुषोंके कामकी वस्तु नहीं है । आलसी और अकर्मण्य पुरुष संतोषी नहीं होते; वे तो कामना की ज्वाला में सदा जलते रहते हैं । उनकी तृष्णा कभी नहीं मिटती । कुशलतापूर्वक कर्म करने की शक्ति और मति न होने के कारण वे संतोष का नाम ले लेते हैं । उनका वह संतोष वस्तुतः आध्यात्मिक पथ के परम साधनरूप ‘संतोष’ से सर्वथा भिन्न एक तामसिक भावमात्र है । संतोष तो मनुष्यको विषयासक्ति से छुडाकर, तृष्णा के तपते हुए प्रवाहसे पृथक करके इश्वराभिमुखी बनाकर सच्चा कर्तव्यशील बना देता है । शांतचित संतोषी पुरुष ही अपने सारे व्यक्तिगत स्वार्थोंको छोड़कर निष्कामभाव से देश और विश्वके कल्याण के लिए सम्यक रूपसे यथायोग्य कर्तव्य-कर्मका आचरण कर सकता है ।

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