गुरु की सीख

बहुत समय पहले की बात है एक विख्यात ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे . उनके गुरुकुल में बड़े-बड़े राजा महाराजाओं के पुत्रों से लेकर साधारण परिवार के लड़के भी पढ़ा करते थे।
वर्षों से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी और सभी बड़े उत्साह के साथ अपने अपने घरों को लौटने की तैयारी कर रहे थे कि तभी ऋषिवर की तेज आवाज सभी के कानो में पड़ी ,
” आप सभी मैदान में एकत्रित हो जाएं। “
आदेश सुनते ही शिष्यों ने ऐसा ही किया।
ऋषिवर बोले , “ प्रिय शिष्यों , आज इस गुरुकुल में आपका अंतिम दिन है . मैं चाहता हूँ कि यहाँ से प्रस्थान करने से पहले आप सभी एक दौड़ में हिस्सा लें .
यह एक बाधा दौड़ होगी और इसमें आपको कहीं कूदना तो कहीं पानी में दौड़ना होगा और इसके आखिरी हिस्से में आपको एक अँधेरी सुरंग से भी गुजरना पड़ेगा .”
तो क्या आप सब तैयार हैं ?”
” हाँ , हम तैयार हैं ”, शिष्य एक स्वर में बोले .
दौड़ शुरू हुई .
सभी तेजी से भागने लगे . वे तमाम बाधाओं को पार करते हुए अंत में सुरंग के पास पहुंचे . वहाँ बहुत अँधेरा था और उसमे जगह – जगह नुकीले पत्थर भी पड़े थे जिनके चुभने पर असहनीय पीड़ा का अनुभव होता था .
सभी असमंजस में पड़ गए , जहाँ अभी तक दौड़ में सभी एक सामान बर्ताव कर रहे थे वहीँ अब सभी अलग -अलग व्यवहार करने लगे ; खैर , सभी ने ऐसे-तैसे दौड़ ख़त्म की और ऋषिवर के समक्ष एकत्रित हुए।
“पुत्रों ! मैं देख रहा हूँ कि कुछ लोगों ने दौड़ बहुत जल्दी पूरी कर ली और कुछ ने बहुत अधिक समय लिया , भला ऐसा क्यों ?”, ऋषिवर ने प्रश्न किया।
यह सुनकर एक शिष्य बोला , “ गुरु जी , हम सभी लगभग साथ –साथ ही दौड़ रहे थे पर सुरंग में पहुचते ही स्थिति बदल गयी …कोई दुसरे को धक्का देकर आगे निकलने में लगा हुआ था तो कोई संभल -संभल कर आगे बढ़ रहा था …और कुछ तो ऐसे भी थे जो पैरों में चुभ रहे पत्थरों को उठा -उठा कर अपनी जेब में रख ले रहे थे ताकि बाद में आने वाले लोगों को पीड़ा ना सहनी पड़े…. इसलिए सब ने अलग-अलग समय में दौड़ पूरी की .”
“ठीक है ! जिन लोगों ने पत्थर उठाये हैं वे आगे आएं और मुझे वो पत्थर दिखाएँ “, ऋषिवर ने आदेश दिया .
आदेश सुनते ही कुछ शिष्य सामने आये और पत्थर निकालने लगे . पर ये क्या जिन्हे वे पत्थर समझ रहे थे दरअसल वे बहुमूल्य हीरे थे . सभी आश्चर्य में पड़ गए और ऋषिवर की तरफ देखने लगे .
“ मैं जानता हूँ आप लोग इन हीरों के देखकर आश्चर्य में पड़ गए हैं .” ऋषिवर बोले।
“ दरअसल इन्हे मैंने ही उस सुरंग में डाला था , और यह दूसरों के विषय में सोचने वालों शिष्यों को मेरा इनाम है।
पुत्रों यह दौड़ जीवन की भागम -भाग को दर्शाती है, जहाँ हर कोई कुछ न कुछ पाने के लिए भाग रहा है . पर अंत में वही सबसे समृद्ध होता है जो इस भागम -भाग में भी दूसरों के बारे में सोचने और उनका भला करने से नहीं चूकता है .
अतः यहाँ से जाते -जाते इस बात को गाँठ बाँध लीजिये कि आप अपने जीवन में सफलता की जो इमारत खड़ी करें उसमे परोपकार की ईंटे लगाना कभी ना भूलें , अंततः वही आपकी सबसे अनमोल जमा-पूँजी होगी । “

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एक हीरा

एक हीरा व्यापारी था जो हीरे का बहुत बड़ा विशेषज्ञ माना जाता था, किन्तु गंभीर बीमारी के चलते अल्प आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी . अपने पीछे वह अपनी पत्नी और बेटा छोड़ गया . जब बेटा बड़ा हुआ तो उसकी माँ ने कहा –
“बेटा , मरने से पहले तुम्हारे पिताजी ये पत्थर छोड़ गए थे , तुम इसे लेकर बाज़ार जाओ और इसकी कीमत का पता लगा, ध्यान रहे कि तुम्हे केवल कीमत पता करनी है , इसे बेचना नहीं है.”
युवक पत्थर लेकर निकला, सबसे पहले उसे एक सब्जी बेचने वाली महिला मिली. ” अम्मा, तुम इस पत्थर के बदले मुझे क्या दे सकती हो ?” , युवक ने पूछा.
” देना ही है तो दो गाजरों के बदले मुझे ये दे दो…तौलने के काम आएगा.”- सब्जी वाली बोली.
युवक आगे बढ़ गया. इस बार वो एक दुकानदार के पास गया और उससे पत्थर की कीमत जानना चाही .
दुकानदार बोला ,” इसके बदले मैं अधिक से अधिक 500 रूपये दे सकता हूँ..देना हो तो दो नहीं तो आगे बढ़ जाओ.”
युवक इस बार एक सुनार के पास गया , सुनार ने पत्थर के बदले 20 हज़ार देने की बात की, फिर वह हीरे की एक प्रतिष्ठित दुकान पर गया वहां उसे पत्थर के बदले 1 लाख रूपये का प्रस्ताव मिला. और अंत में युवक शहर के सबसेबड़े हीरा विशेषज्ञ के पास पहुंचा और बोला,” श्रीमान , कृपया इस पत्थर की कीमत बताने का कष्ट करें .”
विशेषज्ञ ने ध्यान से पत्थर का निरीक्षण किया और आश्चर्य से युवक की तरफ देखते हुए बोला ,” यह तो एक अमूल्य हीरा है , करोड़ों रूपये देकर भी ऐसा हीरा मिलना मुश्किल है.” , यदि हम गहराई से सोचें तो ऐसा ही मूल्यवान हमारा मानव जीवन भी है . यह अलग बात है कि हममें से बहुत से लोग इसकी कीमत नहीं जानते और सब्जी बेचने वाली महिला की तरह इसे मामूली समझा तुच्छ कामो में लगा देते हैं.
आइये हम प्रार्थना करें कि ईश्वर हमें इस मूल्यवान जीवन को समझने की सद्बुद्धि दे और हम हीरे के विशेषज्ञ की तरह इस जीवन का मूल्य आंक सकें .॥

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घमंड

एक भिखारी था| वह न ठीक से खाता था, न पीता था, जिस वजह से उसका बूढ़ा शरीर सूखकर कांटा हो गया था| उसकी एक-एक हड्डी गिनी जा सकती थी| उसकी आंखों की ज्योति चली गई थी| उसे कोढ़ हो गया था| बेचारा रास्ते के एक ओर बैठकर गिड़गिड़ाते हुए भीख मांगा करता था| एक युवक उस रास्ते से रोज निकलता था| भिखारी को देखकर उसे बड़ा बुरा लगता| उसका मन बहुत ही दुखी होता| वह सोचता, वह क्यों भीख मांगता है ?
जीने से उसे मोह क्यों है? भगवान उसे उठा क्यों नहीं लेते? एक दिन उससे न रहा गया|…वह भिखारी के पास गया और बोला -“बाबा, तुम्हारी ऐसी हालत हो गई है फिर भी तुम जीना चाहते हो? तुम भीख मांगते हो, पर ईश्वर से यह प्रार्थना क्यों नहीं करते कि वह तुम्हें अपने पास बुला ले?”

भिखारी ने मुंह खोला -“भैया तुम जो कह रहे हो, वही बात मेरे मन में भी उठती है| मैं भगवान से बराबर प्रार्थना करता हूं, पर वह मेरी सुनता ही नहीं| शायद वह चाहता है कि मैं इस धरती पर रहूं, जिससे दुनिया के लोग मुझे देखें और समझें कि एक दिन मैं भी उनकी ही तरह था, लेकिन वह दिन भी आ सकता है, जबकि वे मेरी तरह हो सकते हैं| इसलिए किसी को घमंड नहीं करना चाहिए|”

लड़का भिखारी की ओर देखता रह गया| उसने जो कहा था, उसमें कितनी बड़ी सच्चाई समाई हुई थी| यह जिंदगी का एक कड़वा सच था, जिसे मानने वाले प्रभु की सीख भी मानते हैं| 🙂

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जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा

एक औरत अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोजाना भोजन पकाती थी और एक रोटी वह वहां से …गुजरने वाले किसी भी भूखे के लिए पकाती थी, वह उस रोटी को खिड़की के सहारे रख दिया करती थी जिसे कोई भी ले सकता था .
एक कुबड़ा व्यक्ति रोज उस रोटी को ले जाता और बजाय धन्यवाद देने के अपने रस्ते पर चलता हुआ वह कुछ इस तरह बडबडाता “जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा ”
दिन गुजर…ते गए और ये सिलसिला चलता रहा ,वो कुबड़ा रोज रोटी लेके जाता रहा और इन्ही शब्दों को बडबडाता “जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा ”
वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी और मन ही मन खुद से कहने लगी कि “कितना अजीब व्यक्ति है ,एक शब्द धन्यवाद का तो देता नहीं है और न जाने क्या क्या बडबडाता रहता है, मतलब क्या है इसका “.

एक दिन क्रोधित होकर उसने एक निर्णय लिया और बोली “मैं इस कुबड़े से निजात पाकर रहूंगी”.और उसने क्या किया कि उसने उस रोटी में जहर मिला दीया जो वो रोज उसके लिए बनाती थी और जैसे ही उसने रोटी को को खिड़की पर रखने कि कोशिश कि अचानक उसके हाथ कांपने लगे और रुक गये और वह बोली “हे भगवन मैं ये क्या करने जा रही थी ?” और उसने तुरंत उस रोटी को चूल्हे कि आँच में जला दीया .एक ताज़ा रोटी बनायीं और खिड़की के सहारे रख दी,

हर रोज कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी लेके “जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा ” बडबडाता हुआ चला गया इस बात से बिलकुल बेखबर कि उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है .
हर रोज जब वह महिला खिड़की पर रोटी रखती थी तो वह भगवान से अपने पुत्र कि सलामती और अच्छी सेहत और घर वापसी के लिए प्रार्थना करती थी जो कि अपने सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए कहीं बाहर गया हुआ था.
महीनों से उसकी कोई खबर नहीं थी.
शाम को उसके दरवाजे पर एक दस्तक होती है ,वह दरवाजा खोलती है और भोंचक्की रह जाती है,
अपने बेटे को अपने सामने खड़ा देखती है.वह पतला और दुबला हो गया था. उसके कपडे फटे हुए थे और वह भूखा भी था ,भूख से वह कमजोर हो गया था. जैसे ही उसने अपनी माँ को देखा,
उसने कहा, “माँ, यह एक चमत्कार है कि मैं यहाँ हूँ. जब मैं एक मील दूर है, मैं इतना भूखा था कि मैं गिर. मैं मर गया होता,

लेकिन तभी एक कुबड़ा वहां से गुज़र रहा था ,उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और उसने मुझे अपनी गोद में उठा लीया,भूख के मरे मेरे प्राण निकल रहे थे मैंने उससे खाने को कुछ माँगा ,उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कह कर दे दी कि “मैं हर रोज यही खाता हूँ लेकिन आज मुझसे ज्यादा जरुरत इसकी तुम्हें है सो ये लो और अपनी भूख को तृप्त करो ” .
जैसे ही माँ ने उसकी बात सुनी माँ का चेहरा पिला पड़ गया और अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाजे का सहारा लीया, उसके मस्तिष्क में वह बात घुमने लगी कि कैसे उसने सुबह रोटी में जहर मिलाया था. अगर उसने वह रोटी आग में जला के नष्ट नहीं की होती तो उसका बेटा उस रोटी को खा लेता और अंजाम होता उसकी मौत
और इसके बाद उसे उन शब्दों का मतलब बिलकुल स्पष्ट हो चूका था “जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा।

” निष्कर्ष ”
~हमेशा अच्छा करो और अच्छा करने से अपने आप को कभी मत रोको फिर चाहे उसके लिए उस समय आपकी सराहना या प्रशंसा हो या न हो .

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एक पुराना फटा सा पर्स

यात्रियों से खचाखच भरी ट्रेन में टी.टी.ई. को एक पुराना फटा सा पर्स मिला। उसने पर्स को खोलकर यह पता लगाने की कोशिश की कि वह किसका है। लेकिन पर्स में ऐसा कुछ नहीं था जिससे कोई सुराग मिल सके। पर्स मेंकुछ पैसे और भगवान श्रीकृष्ण की फोटो थी। फिर उस… टी.टी.ई. ने हवा में पर्स हिलाते हुए पूछा -“यह किसका पर्स है?”
एक बूढ़ा यात्री बोला -“यह मेरा पर्स है। इसे कृपया मुझे दे दें।”टी.टी.ई. ने कहा -“तुम्हें यह साबित करना होगा कि यह पर्स तुम्हारा ही है। केवल तभी मैं यह
पर्स तुम्हें लौटा सकता हूं।”उस बूढ़े व्यक्ति ने दंतविहीन मुस्कान के साथ उत्तर दिया -“इसमें भगवान श्रीकृष्ण की फोटो है।”टी.टी.ई. ने कहा -“यह कोई ठोस सबूत नहीं है। किसी भी व्यक्ति के पर्स में भगवान श्रीकृष्ण की फोटो हो सकती है। इसमें क्या खास बात है? पर्स में तुम्हारी फोटो क्यों नहीं है?”
बूढ़ा व्यक्ति ठंडी गहरी सांस भरते हुए बोला -“मैं तुम्हें बताता हूं कि मेरा फोटो इस पर्स में क्यों नहीं है। जब मैं स्कूल में पढ़ रहा था, तब ये पर्स मेरे पिता ने मुझे दिया था। उस समय मुझे जेबखर्च के रूप में कुछ पैसे मिलते थे। मैंने पर्स में अपने माता-पिता की फोटो रखी हुयी थी।
जब मैं किशोर अवस्था में पहुंचा, मैं अपनी कद-काठी पर मोहित था। मैंने पर्स में से माता-पिता की फोटो हटाकर अपनी फोटो लगा ली। मैं अपने सुंदर चेहरे और काले घने बालों को देखकर खुश हुआ करता था। कुछ साल बाद मेरी शादी हो गयी। मेरी पत्नी बहुत सुंदर थी और मैं उससे बहुत प्रेम करता था। मैंने पर्स में से अपनी फोटो हटाकर उसकी लगा ली। मैं घंटों उसके सुंदर चेहरे को निहारा करता।
जब मेरी पहली संतान का जन्म हुआ, तब मेरे जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ। मैं अपने बच्चे के साथ खेलने के लिए काम पर कम समय खर्च करने लगा। मैं देर से काम पर जाता ओर जल्दी लौट आता। कहने की बात नहीं, अब मेरे पर्स में मेरे बच्चे की फोटो आ गयी थी।” बूढ़े व्यक्ति ने डबडबाती आँखों के साथ
बोलना जारी रखा -“कई वर्ष पहले मेरे माता- पिता का स्वर्गवास हो गया। पिछले वर्ष मेरी पत्नी भी मेरा साथ छोड़ गयी। मेरा इकलौता पुत्र अपने परिवार में व्यस्त है। उसके पास मेरी देखभाल का वक्त नहीं है। जिसे मैंने अपने जिगर के टुकड़े की तरह पाला था, वह अब मुझसे बहुत दूर हो चुका है।
अब मैंने भगवान कृष्ण की फोटो पर्स में लगा ली है। अब जाकर मुझे एहसास हुआ है कि श्रीकृष्ण ही मेरे शाश्वत साथी हैं। वे हमेशा मेरे साथ रहेंगे। काश मुझे पहले ही यह एहसास हो गया होता। जैसा प्रेम मैंने अपने परिवार से किया, वैसा प्रेम यदि मैंने ईश्वर के साथ किया होता तो आज मैं इतना अकेला नहीं होता।”
टी.टी.ई. ने उस बूढ़े व्यक्ति को पर्स लौटा दिया।
अगले स्टेशन पर ट्रेन के रुकते ही वह टी.टी.ई. प्लेटफार्म पर बने बुकस्टाल पर पहुंचा और विक्रेता से बोला -“क्या तुम्हारे पास भगवान की कोई फोटो है? मुझे अपने पर्स में रखने के लिए चाहिए।

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कठोरता और विनम्रता

एक साधु बहुत बूढ़े हो गए थे। उनके जीवन का आखिरी क्षण आ पहुँचा। आखिरी क्षणों में उन्होंने अपने शिष्यों और चेलों को पास बुलाया। जब सब उनके पास आ गए, तब उन्होंने अपना पोपला मुँह पूरा खोल दिया और शिष्यों से बोले-‘देखो, मेरे मुँह में कितने दाँत बच गए हैं?’ शिष्यों ने उनके मुँह की ओर देखा।

कुछ टटोलते हुए वे लगभग एक स्वर में बोल उठे-‘महाराज आपका तो एक भी दाँत शेष नहीं बचा। शायद कई वर्षों से आपका एक भी दाँत नहीं है।’ साधु बोले-‘देखो, मेरी जीभ तो बची हुई है।’

सबने उत्तर दिया-‘हाँ, आपकी जीभ अवश्य बची हुई है।’ इस पर सबने कहा-‘पर यह हुआ कैसे?’ मेरे जन्म के समय जीभ थी और आज मैं यह चोला छोड़ रहा हूँ तो भी यह जीभ बची हुई है। ये दाँत पीछे पैदा हुए, ये जीभ से पहले कैसे विदा हो गए? इसका क्या कारण है, कभी सोचा?’

शिष्यों ने उत्तर दिया-‘हमें मालूम नहीं। महाराज, आप ही बतलाइए।’
उस समय मृदु आवाज में संत ने समझाया- ‘यही रहस्य बताने के लिए मैंने तुम सबको इस बेला में बुलाया है। इस जीभ में माधुर्य था, मृदुता थी और खुद भी कोमल थी, इसलिए वह आज भी मेरे पास है परंतु …….मेरे दाँतों में शुरू से ही कठोरता थी, इसलिए वे पीछे आकर भी पहले खत्म हो गए, अपनी कठोरता के कारण ही ये दीर्घजीवी नहीं हो सके।
दीर्घजीवी होना चाहते हो तो कठोरता छोड़ो और विनम्रता सीखो।’

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पवित्रता और जीवन की सच्चाई

अरावलीकी घनी दुर्गम पहाड़ियोंके बीच एक महत्मा अपनी कुटिया बनाकर निवास करते थे. वे हमेशा साधनामें लीन रहते. महात्मा पिछले २१वर्षोंसे वहाँसे लगभग पांच किलोमीटरकी दूरीपर स्थित नगरमें प्रतिदिन जाया करते और किन्ही पांच गृहस्थोंके घरके सामने अपनी दृष्टि नीची किये हुए भिक्षाके लिए खड़े होते. यदि भिक्षा न मिलती तो बिना कुछ कहे कुटिया में लौट आते. इन २१ वर्षोंमें कभी ऐसा नहीं हुआ की महात्माजी को भिक्षा न मिली हो. बच्चे उन्हें हमेशा परेशान करते. कभी उनके पीछे-पीछे चलकर उन्हें चिड़ाते रहते और जब वे कथा कहते तो हल्ला करते, परन्तु महात्माजी सरल एवं क्षमाशील थे की वे कभी कुछ न बोलते. कोई व्यक्ति जब उनसे ज्ञानसम्बन्धी कोई प्रश्न करता तो वे केवल इतना हे कहते ‘शील, सदाचारका जीवन जियो,नशे,पत्ते तथा व्यभिचारसे सदा बचो.’ इससे अधिक कुछ न कहते.

      जब कोई व्यक्ति यह पूछता की शील-सदाचारसे केसे रहे? तो वे कहते, ‘कोई भी प्राणी छोटा हो या बड़ा, मनुष्य हो अथवा पशु-पक्षी, उसकी हत्या न करो. किसी भी प्रकार उन्हें कष्ट न पहुंचाओ, दुखी न करो. सदा सत्य बोलनेका अभ्यास डालो अर्थात असत्यभाषणसे बचो, किसी अन्यकी वस्तुको लोभवश अपनी बनानेकी चेष्टा न करो अर्थात चोरी से बचो एवं ब्रह्मचर्यका पालन करो तथा संसार में जीनेके लिए आवश्यक सामग्रियोंका कम से कम संग्रह करो. इसीमें सबका मंगल समाया हुआ है और यही सच्चा धर्म है.’ उनकी इस तरहकी शिक्षापर कोई विशेष ध्यान न देता. कुछ लोग उनकी बातोंको ठीक कहते, परन्तु धारण करनेका प्रयत्न न करते. इसी प्रकार उनकी २१ वर्षोंकी प्रक्रिया चलती जा रही थी.

एक बार महात्माजी अचानक बीमार पड़ गए तथा ऐसे पड़े की न तो वे भिक्षाके लिए १२ दिनोंतक नगरमें जा और न ही लोगोको इस बात का ध्यान आया कि महात्माजी आजकल भिक्षा के लिए क्यों नही आ रहे? बीमारीकी वजहसे  महात्माजी चलने-फिरनेमें इतने आशक्त हो गए कि उनका उठना-बैठना भी मुश्किल हो गया. वे सोचने लगे कि यदि मै भिक्षा न लाऊंगा तो भूखके कारण मेरी मृत्यु हो जायगी. मन में संकल्प करके वे नगरमें जाने को तैयार हुए. किसी प्रकार वे आधा रास्ता तय कर पाए थे कि अशक्तता के चलते मूर्छा खाकर गिर पड़े. जब उन्हें होश आया तो उन्होंने अपने-आपको एक आमके वृक्षके नीचे पाया. वह आमका वृक्ष फलोंसे लदा हुआ था. महात्माजीने दृष्टि उठाकर देखा तो वहां आस-पास पकेआम जमीनपर गिरे पड़े थे. प्रथमतया तो उन्होंने आम खाकर क्षुधा शांत करनेकी सोची, परन्तु दूसरे ही क्षण उन्हें ध्यान आया कि ये आम तो दूसरेके  है और मै बिना अनुमति इन्हें कैसे  खा सकता हूँ? यह ध्यान आते ही उन्होंने आम खाने का विचार त्याग दिया तथा वहीं उसी अवस्थामें पड़े रहे. तभी थोरी देर बाद उस बगीचे का मालिक किसान वहां आया और उसने महात्माजीको देखा. उनकी अवस्था देख उसने तुरंत महात्माजीके ऊपर पानी का छींटा मारा, इससे महात्माजी चेतनामें आये. किसान ने उनसे पूछा- “महात्माजी! आपकी ऐसी दयनीय दशा कैसे हो गयी और आप कैसे  यहाँ पड़े है? महात्माजीने सारा वृतांत कह सुनाया. किसानने उनसे कहा – ‘महात्माजी! यदि ऐसी बात है तो यहाँ इतने सारे फल गिरपड़े है, भला आपने इन्हें खाकर अपनी भूख क्योँ नहीं मिटाई?’ इस पर महात्माजीने उत्तर दिया-‘देखो भाई ! ये तुम्हारे बगीचेके आम है. इसपर तुम्हारा अधिकार है, सो तुम्हारी आज्ञाके बिना भला मै कैसे इन्हें खा सकता था. ऐसा करना तो पाप है.’ यह सुनकर किसानकी आँखोंसे झर-झर आसूँ बहने लगे. उसने कहा- महाराज! भाग्यवश मै यहाँपर आ गया, अन्यथा भूखके मारे आपके प्राण-पखेरू उड़ जाते.’ महात्माजीने कहा –‘किसी दूसरेकी वस्तुका उपयोग उसके स्वामीकी अनुमतिके बिना ले लेना पाप ही तो है. भला, मै यह कैसे कर सकता हूँ, यह तो मेरे शील-व्रत अर्थात धर्मके विपरीत बात है, चाहे मेरा शरीर मृत्युको प्राप्त हो जाता, पर यह अधर्म है. ऐसा नही करना चाहिए.’

यह सुनते ही करुणा एवं दयावश किसानकी आँखोंमें अश्रु भर आये और उसने उनके आहार एवं सेवा-शुश्रूषाकि व्यवस्था की.

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पवित्रता और जीवन की सच्चाई

अरावलीकी घनी दुर्गम पहाड़ियोंके बीच एक महत्मा अपनी कुटिया बनाकर निवास करते थे. वे हमेशा साधनामें लीन रहते. महात्मा पिछले २१वर्षोंसे वहाँसे लगभग पांच किलोमीटरकी दूरीपर स्थित नगरमें प्रतिदिन जाया करते और किन्ही पांच गृहस्थोंके घरके सामने अपनी दृष्टि नीची किये हुए भिक्षाके लिए खड़े होते. यदि भिक्षा न मिलती तो बिना कुछ कहे कुटिया में लौट आते. इन २१ वर्षोंमें कभी ऐसा नहीं हुआ की महात्माजी को भिक्षा न मिली हो. बच्चे उन्हें हमेशा परेशान करते. कभी उनके पीछे-पीछे चलकर उन्हें चिड़ाते रहते और जब वे कथा कहते तो हल्ला करते, परन्तु महात्माजी सरल एवं क्षमाशील थे की वे कभी कुछ न बोलते. कोई व्यक्ति जब उनसे ज्ञानसम्बन्धी कोई प्रश्न करता तो वे केवल इतना हे कहते ‘शील, सदाचारका जीवन जियो,नशे,पत्ते तथा व्यभिचारसे सदा बचो.’ इससे अधिक कुछ न कहते.

      जब कोई व्यक्ति यह पूछता की शील-सदाचारसे केसे रहे? तो वे कहते, ‘कोई भी प्राणी छोटा हो या बड़ा, मनुष्य हो अथवा पशु-पक्षी, उसकी हत्या न करो. किसी भी प्रकार उन्हें कष्ट न पहुंचाओ, दुखी न करो. सदा सत्य बोलनेका अभ्यास डालो अर्थात असत्यभाषणसे बचो, किसी अन्यकी वस्तुको लोभवश अपनी बनानेकी चेष्टा न करो अर्थात चोरी से बचो एवं ब्रह्मचर्यका पालन करो तथा संसार में जीनेके लिए आवश्यक सामग्रियोंका कम से कम संग्रह करो. इसीमें सबका मंगल समाया हुआ है और यही सच्चा धर्म है.’ उनकी इस तरहकी शिक्षापर कोई विशेष ध्यान न देता. कुछ लोग उनकी बातोंको ठीक कहते, परन्तु धारण करनेका प्रयत्न न करते. इसी प्रकार उनकी २१ वर्षोंकी प्रक्रिया चलती जा रही थी.

एक बार महात्माजी अचानक बीमार पड़ गए तथा ऐसे पड़े की न तो वे भिक्षाके लिए १२ दिनोंतक नगरमें जा और न ही लोगोको इस बात का ध्यान आया कि महात्माजी आजकल भिक्षा के लिए क्यों नही आ रहे? बीमारीकी वजहसे  महात्माजी चलने-फिरनेमें इतने आशक्त हो गए कि उनका उठना-बैठना भी मुश्किल हो गया. वे सोचने लगे कि यदि मै भिक्षा न लाऊंगा तो भूखके कारण मेरी मृत्यु हो जायगी. मन में संकल्प करके वे नगरमें जाने को तैयार हुए. किसी प्रकार वे आधा रास्ता तय कर पाए थे कि अशक्तता के चलते मूर्छा खाकर गिर पड़े. जब उन्हें होश आया तो उन्होंने अपने-आपको एक आमके वृक्षके नीचे पाया. वह आमका वृक्ष फलोंसे लदा हुआ था. महात्माजीने दृष्टि उठाकर देखा तो वहां आस-पास पकेआम जमीनपर गिरे पड़े थे. प्रथमतया तो उन्होंने आम खाकर क्षुधा शांत करनेकी सोची, परन्तु दूसरे ही क्षण उन्हें ध्यान आया कि ये आम तो दूसरेके  है और मै बिना अनुमति इन्हें कैसे  खा सकता हूँ? यह ध्यान आते ही उन्होंने आम खाने का विचार त्याग दिया तथा वहीं उसी अवस्थामें पड़े रहे. तभी थोरी देर बाद उस बगीचे का मालिक किसान वहां आया और उसने महात्माजीको देखा. उनकी अवस्था देख उसने तुरंत महात्माजीके ऊपर पानी का छींटा मारा, इससे महात्माजी चेतनामें आये. किसान ने उनसे पूछा- “महात्माजी! आपकी ऐसी दयनीय दशा कैसे हो गयी और आप कैसे  यहाँ पड़े है? महात्माजीने सारा वृतांत कह सुनाया. किसानने उनसे कहा – ‘महात्माजी! यदि ऐसी बात है तो यहाँ इतने सारे फल गिरपड़े है, भला आपने इन्हें खाकर अपनी भूख क्योँ नहीं मिटाई?’ इस पर महात्माजीने उत्तर दिया-‘देखो भाई ! ये तुम्हारे बगीचेके आम है. इसपर तुम्हारा अधिकार है, सो तुम्हारी आज्ञाके बिना भला मै कैसे इन्हें खा सकता था. ऐसा करना तो पाप है.’ यह सुनकर किसानकी आँखोंसे झर-झर आसूँ बहने लगे. उसने कहा- महाराज! भाग्यवश मै यहाँपर आ गया, अन्यथा भूखके मारे आपके प्राण-पखेरू उड़ जाते.’ महात्माजीने कहा –‘किसी दूसरेकी वस्तुका उपयोग उसके स्वामीकी अनुमतिके बिना ले लेना पाप ही तो है. भला, मै यह कैसे कर सकता हूँ, यह तो मेरे शील-व्रत अर्थात धर्मके विपरीत बात है, चाहे मेरा शरीर मृत्युको प्राप्त हो जाता, पर यह अधर्म है. ऐसा नही करना चाहिए.’

यह सुनते ही करुणा एवं दयावश किसानकी आँखोंमें अश्रु भर आये और उसने उनके आहार एवं सेवा-शुश्रूषाकि व्यवस्था की.

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निष्पाप प्राणी

एक वृद्ध महात्माके दर्शन करने गया था। अब वे कहाँ हैं-है भी उनका शरीर या नहीं, पता नहीं। उसके पास कुछ और लोग भी बैठे थे। मैं भी प्रणाम करके बैठ गया। इतनेमें एक रोगीको लेकर दो-तीन व्यक्ति आये। रोगी स्त्री थी, युवती थी और अत्यन्त पीड़ामें थी। उसके पूरे शरीरमें भयंकर ऐंठन थी। चीखती थी, छटपटाती थी। उसका क्रन्दन किसीका भी हृदय हिला देता। ‘सब कर्म का भोग है।’ महात्माने शान्त स्वरमें कहा-‘अपने पापकर्म का फल अपनी ही सिर तो आयेगा। किंतु इसकी पीड़ा बहुत कम हो जायेगी, यदि किसी निष्पापकी चरणरज इसके शरीरमें लगा दी जाय।’

उस व्यक्तिने, जो स्त्रीके साथ आया था, महात्माजीकी ही चरणरज उठायी तो वे बोले-‘नारायण! इस धूलिमें क्या धरा है। यह तो पापोंका पुतला है। वेश देखकर भ्रममें पड़नेसे कोई लाभ तुम्हें नहीं होगा।’ स्वार्थ अन्धा होता है। उस व्यक्तिने वह चरणरज उस स्त्रीको लगायी; किंतु कोई लाभ नहीं हुआ। अब वहाँ बैठे सभी लोगोंने महात्माजीसे ही पूछा-‘निष्पाप पुरुष कहाँ मिलेगा?’

‘निष्पाप मनुष्य या निष्पाप प्राणी?’ मैंने पूछ लिया, क्योंकि महात्माजी भी निष्पाप मनुष्यका पता जानते होंगे, ऐसा कोई संकेत उन्होंने नहीं दिया। निष्पाप प्राणी हो तो भी ठीक है; किंतु महात्माजी ने कहा-‘नारायण,मनुष्य ही निष्पाप नहीं होगा तो पशु-पक्षी कहाँसे निष्पाप होंगे, वे तो कर्मयोनिमें हैं ही पापभोगके लिये। ‘अपने पाप वे भोगते हैं। किंतु उनमें एक प्राणीका शरीर शास्त्र निष्पाप तथा परम पवित्र कहता है।’

मैं उठ खड़ा हुआ था-‘यह गाय सर्वथा निष्पाप है।’ पासमें एक बूढ़ी गाय चर रही थी। उसके खुरोंके चिन्हकी धूलि मैं उठा लाया और गायकी महिमा उसी समय मुझे देखनेको मिली। उस स्त्रीका चिल्लाना-रोना धूलि लगाते ही बंद हो गया। महात्माजी उठकर उस बूढ़ी गायको भूमिमें पड़कर प्रणिपात कर रहे थे।

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नौलखा हार

एक राज कन्या अपनी सखियों के साथ जल क्रीडा के लिए गयी. सरोवर के किनारे राज कन्या ने अपना अनमोल गले का हार उतार कर रख दिया. सभी स्नान का सुख लेकर जल से बाहर निकल अपने अपने कपडे पहनने लगे. राज कन्या का नौलखा हार नहीं मिल रहा.  किसी सखी की शरारत नहीं क्योंकि सभी सरोवर के भीतर थी. इधर उधर खोजने पर भी हार ना मिला. महल पहुँच कर राजा को सुचना दी गयी, नगर में घोषणा हुई जो ढूंढ कर लौटाएगा, उसे एक लाख रुपये इनाम मिलेगा. खोज शुरू हुई, लेकिन सभी असफल हुए. एक लकड़हारा प्यास से व्याकुल हो पानी पीने के लिए उसी सरोवर के किनारे गया. पानी पीते पीते उसे हार तल पर पड़ा दिखाई दिया. उसकी प्रसन्नता की सीमा ना रही, डुबकी लगाई हार पकड़ने की कोशिश की लेकिन हाथ में हार नहीं कीचड आता. बाहर निकला, जल निश्चल हुआ पुनः हार दिखा, डुबकी लगाई फिर हाथ में पंक. जाकर राजा को सूचना दी, विशेषज्ञ बुलवाए गए. उनके भी सभी प्रयास विफल हुए. सभी चकित एवं निराश.
एक संत का आगमन हुआ. भीड़ का कारण पूछा. समस्या सुनी – कुशाग्र बुद्धि थे, अविलम्ब समझ गए. हार ऊपर पेड़ पर लटक रहा था. जिसे पंची उठा कर अपने घोंसले में ले गया था. उसी का प्रतिबिम्ब जल में दिखाई दे रहा था. छाया को कैसे पकड़ा जाए. अतः सब के हाथ में कीचड.

हम चाहते तो बिम्ब हैं – परम सुख और पकड़ रहे हैं प्रतिबिम्ब को – नश्वर सुख को. तो हाथ में कीचड ही आता है. अर्थात् दुःख या दुःख युक्त सुख ही जीवन भर मिलता है. हमारी खोज ही त्रुटिपूर्ण है. उस सुख को पाने के लिए यात्रा शुरू करो. सदा स्मरणीय तथ्य याद रखें – प्रतिबिम्ब से वास्तु प्राप्त नहीं होती अतः बिम्ब को पकड़ो अर्थात् उसे पकड़ो जहाँ सुख निवास करता है. विषय सुख या संसारी सुख उस परमानन्द परमसुख की परछाई है. अतएव संसार से कभी सुख नहीं मिलेगा. शान्ति, सुख और आनंद रूपी हीरों का हार जिसे हम संसार में प्रतिबिम्ब की तरह पाने की कोशिश कर रहे हैं और निराश होते हैं. कीचड अर्थात् दुःख बार बार हाथ लगता है. उस सुख शान्ति आनंद का स्त्रोत है परमात्मा अर्थात् बिम्ब. इसी की प्राप्ति है प्रत्येक के जीवन का लक्ष्य.

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